मंदी की आहट
संरचनात्मक विकास में तेजी की जरूरत
यूं तो अमेरिका समेत विश्व की तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में मंदी की दस्तक महसूस की जा रही है, लेकिन देश में कुछ आर्थिक संकेत चिंता बढ़ाने वाले हैं। इन चिंताओं का जिक्र करने वालों में केंद्रीय बैंक के मौजूदा गवर्नर शक्तिकांत दास व पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी शामिल हैं। हाल ही के दिनों में अर्थव्यवस्था की नाक मानी जाने वाली ऑटो इंडस्ट्री में तेजी से आई गिरावट तथा लाखों की संख्या में अस्थायी कर्मियों की नौकरी जाने से इन चिंताओं को बल मिला है। चिंता की बात यह है कि लगातार चौथी बार रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट में कमी करने के बावजूद जमीनी स्थितियां बदली नहीं हैं। एक तो बैंकों ने उस अनुपात में उपभोक्ताओं को लाभ नहीं दिया, दूसरे क्रय शक्ति में तत्काल वृद्धि नजर नहीं आ रही है। केंद्रीय बैंक का आशावाद हकीकत में तबदील होता नजर नहीं आता। देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर में गिरावट आने और निर्यातों में कमी भी अर्थव्यवस्था में सुस्ती के संकेत दे रही है। एक वजह यह भी है कि अमेरिका द्वारा संरक्षणवादी नीतियों के अनुसरण तथा विकासशील देश के रूप में भारतीय उत्पादों को मिली छूट को खत्म करने का असर भी भारतीय निर्यातों पर पड़ा है। दूसरी ओर अमेरिका व चीन के बीच जारी व्यापार युद्ध भी शेयर बाजारों को प्रभावित करता रहा है। कहीं न कहीं सरकार की आर्थिक नीतियां बाजार में उत्साह का संचार नहीं कर पा रही हैं। एक तथ्य यह भी है कि आर्थिकी एक दशक के अंतराल में मंदी के कारकों से प्रभावित होती ही है। हालांकि पिछली वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में भी भारतीय अर्थव्यवस्था स्थिर रही थी मगर यह भी चिंता की बात है कि सरकार के जीडीपी के आंकड़ों और कॉरपोरेट की आर्थिक उपलब्धियों में साम्य नजर नहीं आता है। कर्ज लेने की दर में गिरावट भी आई है और बैंक गैर निष्पादित कर्ज से जूझते रहे हैं।
नि:संदेह औद्योगिक उत्पादन में आशा के अनुरूप वृद्धि न हो पाना भी अर्थव्यवस्था में सुस्ती की एक वजह रही है, जिसके चलते हमारे निर्यात भी प्रभावित हुए हैं। बावजूद इसके कि उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार कम होने से सतत विकास की आस लगायी जा रही थी। नि:संदेह ऐसे वक्त में सरकार के आर्थिक नीति नियंताओं को तत्काल रूप से पहल करनी चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था को और शिथिल पड़ने से रोका जा सके। हालांकि केंद्रीय बैंक के गवर्नर ने आंतरिक व बाह्य चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा था कि निराश होने की बजाय आगे के अवसरों को देखना चाहिए। इसके लिये जरूरी है कि अर्थव्यवस्था के स्तर पर ऐसे कदम उठाये जाएं जो बेहतर परिणामों की उम्मीद जगाएं। दबे पांव आ रही मंदी को रोकने के लिये जरूरी है कि आर्थिक विकास, निवेश और औद्योगिक उत्पादन में तेजी लायी जाये, जिससे लोगों की क्रय शक्ति में वृद्धि हो और बाजार में मांग बढ़े तो अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। जिससे आम आदमी को राहत मिले और वह आने वाले समय को लेकर चिंतित न नजर आये। ऐसे में जरूरी है कि सरकार आवास, सड़क निर्माण परियोजनाओं के अलावा ग्रामीण संरचनात्मक विकास को प्राथमिकता दे। इससे जहां रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी वहीं देश की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। यदि विदेशी निवेश में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही है तो सरकार निजी निवेश को बढ़ावा दे। इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े सरकारी निवेश से भी हालात में बदलाव आ सकता है। ऐसे में गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को संरक्षण देने की बात आर्थिक मामलों के जानकार कर रहे हैं। ये कंपनियां उपभोक्ता सामग्रियों के लिये कर्ज देती हैं। इनके कमजोर होने से बाजार में गिरावट देखी जाती है। यही वजह है कि पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन सरकार से ऊर्जा और गैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्रों की समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर दूर करने की बात कर रहे हैं।
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