स्कूलों की दुविधा
आधी-अधूरी तैयारी से न हो पहल
कोरोना संकट के चलते लागू लॉकडाउन में छूट के बाद सामान्य जीवन धीरे-धीरे पटरी पर लौट रहा है। बाजार, मॉल व धार्मिक स्थल खुलने के बाद स्कूल-कॉलेज खोलने की बात कही जा रही है। ऐसे दौर में जब देश में कोरोना संक्रमितों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है तो अभिभावकों का अपने बच्चों को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक है। हरियाणा समेत कुछ राज्यों में नियम-शर्तों के साथ शिक्षण संस्थाएं खोलने पर विचार हो रहा है। ऐसे में यह कदम कई जटिलताओं से भरा है। वह भी तब जब चिकित्सा विशेषज्ञ जुलाई में कोरोना संक्रमण चरम पर पहुंचने की बात कह रहे हैं, शिक्षण संस्थाएं खोलना बच्चों की सुरक्षा की दृष्टि से उचित होगा? इस दिशा में गहन-मंथन करने की जरूरत है। सुरक्षा के तमाम चाक-चौबंद इंतजाम के बाद ही इस दिशा में सोचना चाहिए। कहा जा रहा है कि पहले दसवीं से ऊपर की कक्षाओं के लिए स्कूल खुलेंगे, जिसको लेकर अभिभावक आशंकित हैं। जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा स्कूल फिर से खोलने की घोषणा के बाद विरोधी सुर सुनाई दिये हैं। हरियाणा सरकार कह रही है कि जुलाई में सीनियर छात्रों के लिए स्कूल शुरू किये जायेंगे। फिर अगस्त में कॉलेज सीमित समय और सीमित छात्रों की उपस्थिति के साथ खुलेंगे। नि:संदेह कोरोना काल के संकट से अन्य क्षेत्रों के साथ शिक्षा व्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही देश के करीब 33 करोड़ विद्यार्थी घरों तक सीमित हो गये। पूरी दुनिया में 70 फीसदी छात्रों पर लॉकडाउन का असर पड़ा है। लॉकडाउन के चलते विद्यार्थियों को अपने भविष्य की चिंता है और कई तरह की मानसिक चुनौतियों से उन्हें जूझना पड़ रहा है। नि:संदेह आम जीवन की तरह ही शिक्षा भी पिछले तीन महीने से असामान्य परिस्थितियों से गुजर रही है।
दरअसल, अचानक पैदा हुए कोरोना संकट से उपजी परिस्थितियों के लिए देश की शिक्षा व्यवस्था तैयार नहीं थी। कहने के लिए तो शहरों ने विकल्प के रूप में ऑनलाइन शिक्षा को चुना, मगर देश के ग्रामीण इलाकों व वंचित समाज के बच्चों को इस सुविधा से वंचित होना पड़ा। सवाल यह उठा कि क्या ई-लर्निंग क्लास रूम का विकल्प बन सकती है? सुविधा से वंचित छात्र व्यवस्था में खुद को पिछड़ा महसूस कर रहे हैं। केरल में मलप्पुरम की एक छात्रा द्वारा स्मार्टफोन न होने के चलते ऑनलाइन शिक्षा से वंचित रहने पर आत्महत्या करने की खबर विचलित करती है। जब भारत में केवल 24 फीसदी घरों तक ही इंटरनेट की उपलब्धता है तो ऑनलाइन शिक्षा की सार्थकता पर स्वयं सवाल उठ जाते हैं। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा से वंचित छात्रों के अभिवावकों का चिंतित होना स्वाभाविक है। वे बच्चों को सुरक्षा कारणों से स्कूल भेजने से कतराते हैं और घर में पढ़ाने में असमर्थ हैं। ऐसे में स्कूल खोलने की घोषणा उनकी चिंताओं को बढ़ाती है। बच्चे इसके चलते कई तरह के मानसिक दबावों से गुजर रहे हैं। अपने भविष्य को लेकर उनकी चिंताएं वाजिब हैं। वहीं दूसरी ओर स्कूलों को खोलने का विकल्प भी कई जटिलताओं को लिये हुए है। खासकर तब तक जब तक कि कोरोना महामारी की कारगर वैक्सीन नहीं ढूंढ़ ली जाती। नि:संदेह कोरोना के बाद के काल में शिक्षा के तौर-तरीके बदलने वाले हैं, जिसके लिए शिक्षकों और छात्रों को तैयार रहने की जरूरत है। वह भी तब जबकि वैकल्पिक योजनाएं व्यावहारिक साबित नहीं हो पा रही हैं। इन हालात में शिक्षा विभाग को बच्चों के भविष्य को लेकर संवेदनशील व्यवहार करना होगा। खासकर उन स्कूलों में जहां शिक्षा परंपरागत तौर-तरीकों से दी जा रही है। हालांकि सरकार का कहना है कि वह मानव संसाधन मंत्रालय, गृह मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर गाइड लाइंस तैयार कर रही है कि कैसे स्कूलों का वातावरण सुरक्षित बनाया जा सके। जाहिर है पढ़ने-पढ़ाने का तरीका भी बदलने वाला है।
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