श्रमिकों की सुध
फिर कोई जड़ों से न उखड़े
ऐसे वक्त में जब बेहद विषम परिस्थितियों से जूझते हुए लाखों श्रमिक अपने घरों को लौट चुके हैं, सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है कि केंद्र व राज्य सरकारें घर जाने के इच्छुक श्रमिकों को उनके गृह राज्यों में पहुंचाना पंद्रह दिन में सुनिश्चित करें। भले ही देर से सही, मगर इस फैसले के खास मायने हैं। इस दृष्टिकोण से भी अदालत ने आदेश दिये हैं कि लॉकडाउन उल्लंघन के जितने भी मामले श्रमिकों के खिलाफ दर्ज किये गये, उन्हें वापस लिया जाये। किसी को भुखमरी का सामना न करना पड़े, इसीलिये गांव लौटे श्रमिकों के कौशल के आधार पर गांव व प्रखंड स्तर पर रोजगार की व्यवस्था भी राज्य सुनिश्चित करे। कोर्ट ने कहा है कि पलायन करने वाले श्रमिकों की पहचान करके उनका डाटा तैयार किया जाये, उनकी स्किल मैपिंग की जाये तथा योग्यता के अनुसार रोजगार दिया जाये। यह आने वाला वक्त ही बताएगा कि बदहाली की आर्थिक व्यवस्था वाली सरकारें कितनी गंभीरता से समस्या के समाधान का प्रयास करती हैं। पहले भी स्वत: संज्ञान लेते हुए 28 मई को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों व रेलवे से कहा था कि श्रमिकों से रेल का किराया न लिया जाये और उनके भोजन की व्यवस्था करे। यह लाखों कामगारों के लिए राहत की बात है कि कोर्ट ने उनकी जीविका सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकारों पर दबाव बनाया है। नि:संदेह श्रमिकों के कौशल के आधार पर उनका समायोजन जरूरी है। अन्यथा बेरोजगारी, हताशा व तनाव के घातक सामाजिक परिणाम हो सकते हैं। जिले, तहसील और प्रखंड स्तर पर विभिन्न सरकारी योजनाओं में घर लौटे श्रमिकों का समायोजन किया जाना चाहिए। अन्यथा उनके सामने बेकारी-भुखमरी का संकट पैदा हो सकता है। सत्ताधीशों को स्वीकारना चाहिए कि उनकी विफलता के बाद ही न्यायालय को सक्रिय होना पड़ता है। साथ ही यह भी कि केंद्र व राज्य सरकारें श्रमिक समस्या के समाधान में विफल साबित हुई हैं।
बहरहाल, 25 मार्च को लागू हुए लॉकडाउन ने हमें भारतीय समाज के ऐसे भयावह सच से रूबरू कराया है, जिसको जानने की ईमानदार कोशिश हमारे सत्ताधीशों ने नहीं की। लॉकडाउन का विकल्प उन देशों में तो कारगर हो सकता था जहां लोगों के सिरों पर छत और पेट में दाने थे। फिर दूसरे देशों की सरकारों ने इसे लागू करने से पहले कमजोर वर्ग को राहत दी। दरअसल, भारत जैसे देश में जहां करोड़ों लोग रोज कमाने-खाने वाले तथा लाखों लोग फुटपाथ पर सोने वाले थे, उनके बारे में संवेदनशील ढंग से नहीं सोचा गया। लॉकडाउन शुरू होने के बाद दिल्ली-उत्तर प्रदेश की सीमा पर जो जनसैलाब उमड़ा, सत्ताधीशों को उसे खतरे की घंटी मानकर तुरंत श्रमिक ट्रेन चलानी चाहिए थी, तब संक्रमण का ऐसा खतरा भी नहीं था, जैसे अब ट्रेन चलाने के वक्त पैदा है। सत्ताधीशों ने लॉकडाउन की सख्ती से असहाय-बेबस हुए करोड़ों लोगों के दर्द को नजरअंदाज किया। ये वे लोग थे जो अपने राज्यों के तंत्र की विसंगतियों के शिकार होकर घर-बार छोड़कर महानगरों में रोजी-रोटी के जुगाड़ के लिए विषम परिस्थितियों में रह रहे थे। तब न सरकारों ने इनके दर्द को महसूस किया और न ही इन शहरों के लोगों ने, जिनके लिए ये खटते रहे हैं। बहरहाल, कोरोना काल के सबक यही हैं कि जुमलों से हटकर आत्मनिर्भर गांव की ओर मुड़ा जाये। विकास शहर केंद्रित न हो। तकनीक व संसाधन गांव-देहात के तरफ मोड़े जायें। प्रशासन का विकेंद्रीयकरण हो। गांव में कुटीर व लघु उद्योंगों के लिए वातावरण तैयार किया जाये। करोड़ों लोग जो महानगरों में झुग्गी-झोपड़ियों में दोयम दर्जे का जीवन जीने को मजबूर होते हैं, वे खुशी से गांव नहीं छोड़ते। यदि गांव में रोजगार के सम्मानजनक अवसर मिलेंगे तो कोई प्रवासी कहलाना नहीं चाहेगा। अब जब लाखों कामगार अपने घरों को चले गये हैं तो कदम-कदम पर उद्योग जगत, खेती और अन्य व्यवसायों को इन लोगों की कमी खलेगी, जिन्होंने अपने खून-पसीने से शहरों को संवारा था।
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