चूक की हूक
रणनीतिक दृष्टि से अनुचित तात्कालिक प्रतिक्रिया
लद्दाख के भारतीय क्षेत्र में चीनी अतिक्रमण के बाद कूटनीतिक व सैन्य स्तर पर जो सुस्ती नजर आई है, कहीं न कहीं वह गलवान हादसे का सबब बनी है। विगत के अनुभव से पता चलता है कि संकट का कोहरा जितना घना होता है, भारतीय रणनीतिक पहल उतनी ही अस्पष्ट नजर आने लगती है। गलवान घटनाक्रम के बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर और उनके चीनी समकक्ष वांग यी के मध्य बुधवार को फोन पर बातचीत हुई, जिसमें भारत ने दोटूक शब्दों में कहा कि गलवान में भारतीय सैनिकों पर निर्मम आक्रमण पूर्व नियोिजत था। यह भी कि हमले के लिए चीनी सेना जिम्मेदार है। नि:संदेह यदि ऐसा हुआ है तो हम सैन्य रणनीति और कूटनीतिक स्तर पर चूके हैं। भारत ने चीन से कहा कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने यथास्थिति को बनाये रखने के पूर्व समझौते का अतिक्रमण किया है। यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जो स्थिति है उसमें पीएलए ने छेड़छाड़ की है। दूसरे शब्दों में जो जमीनी हकीकत है उसका अतिक्रमण किया गया है। इसका एक निष्कर्ष यह भी है कि चीन ने भारतीय क्षेत्र में संरचनाओं में बदलाव करके शिविर स्थापित किये हैं, जिसकी वास्तविकता से देश का जनमानस अनभिज्ञ रहा। वहीं सेना भी इस बात का आकलन नहीं कर पायी कि चीनी सेना हथियारों का प्रयोग न करने के समझौते के बावजूद घातक विकल्पों का इस्तेमाल कर सकती है। कहीं न कहीं हम उनके घातक मंसूबों को भांपने में नाकामयाब रहे हैं। ऐसे तमाम सवाल हैं जो जवाब मांगते हैं। कहीं न कहीं दिल्ली के स्तर पर आसन्न संकट को भांपने में चूक नजर आती है। यह भांपते हुए कि चीन एक अविश्वसनीय देश है, हमारी रणनीति में दूरगामी परिणामों को भांपने में कोताही नजर आती है। विडंबना देखिए कि जब लद्दाख में बारह जून को भारत व चीन की सेनाएं आमने-सामने थीं, तब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम ने शंघाई टनल इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन को 1,126 करोड़ रुपये का टनल बनाने का प्रोजेक्ट भारतीय दिग्गज टाटा और लार्सन एंड टुब्रो की बोली खारिज करके दिया। यह प्रोजेक्ट सैन्य दृष्टि से संवेदनशील हिंडन एयरफोर्स स्टेशन के करीब है।
विडंबना देखिये कि गलवान की घटना के उपरांत चीन के खिलाफ उपजे आक्रोश के बाद भारतीय टेलीकॉम सेक्टर को चीनी उपकरणों की संवेदनशीलता के बाबत आगाह किया। साथ ही निजी दूरसंचार ऑपरेटरों से चीनी हार्डवेयर तथा भारतीय रेलवे और भारत संचार निगम लिमिटेड के अनुबंधों को रद्द करना देर से उठाया गया कदम तथा छोटी प्रतिक्रिया है। नि:संदेह देश की आर्थिक सुरक्षा और संवेदनशील सैन्य क्षमताओं के लिए रणनीतिक योजनाएं तब असरकारी नहीं रह जातीं जब सीमा पर संघर्ष की स्थिति बनी हुई हो। ऐसा रणनीति के स्थायी ढांचे को अंजाम देते वक्त दूरगामी नजरिये को ध्यान में रखकर स्वाभाविक रूप से पहले ही किया जाना चाहिए। नि:संदेह हमारे नीति-नियंताओं ने इन खतरों को भांपने में देरी की है। गलवान की घटनाओं के बाद यदि देशव्यापी आक्रोश चीनी उत्पादों को लेकर पनप रहा है, तो यह भी विचारणीय है कि क्या हम चीनी उत्पादों का विकल्प देने की स्थिति में हैं? इसी बीच मीिडया रिपोर्टों में कुछ सैन्य अफसरों समेत दस जवानों को चीन द्वारा बृहस्पतिवार को रिहा करने की बात कही गई है। हालांकि, इस प्रकरण पर सेना और सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया। इससे पहले सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि उसका कोई सैनिक लापता नहीं है। ऐसे में सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने देश की जनता को लद्दाख की वास्तविक स्थिति से अवगत कराने में विलंब की जो बात कही है उसकी पुष्टि मौजूदा घटनाक्रम से होती है। साथ ही विपक्ष ने राष्ट्रीय हितों के लिए सरकार को समर्थन की बात कही है। नि:संदेह राष्ट्र से जुड़े ऐसे मुद्दों में पारदर्शिता आपेक्षित है।
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