राजनीतिक एजेंडे से ऊपर उठने की जरूरत
राजनीतिक हितों के टकराव के चलते दिल्ली में कोरोना के खिलाफ जो लड़ाई निष्प्रभावी नजर आ रही थी, अब केंद्र व आप सरकार के बीच बेहतर तालमेल से नई उम्मीद जगी है। दिल्ली में जिस तेजी से संक्रमण बढ़ा और मरीज उपचार के लिए जिस तरह दर-दर की ठोकरें खा रहे थे, उससे पूरे देश का मनोबल गिरा और दुनिया में भारत की छवि का अच्छा संदेश नहीं गया। दुनिया के लिए दिल्ली भारत की राजधानी है, उसे राज्य इकाई के रूप में कमजोर प्रशासन या आप की सरकार होने से कोई सरोकार नहीं है। यह संदेश भी देश-दुनिया में गया कि जब दिल्ली की हालत इतनी खराब है तो शेष देश का क्या हाल होगा। पिछली एक सदी के इस सबसे बड़े संकट का मुकाबला सजगता व मिल-जुलकर ही किया जा सकता है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की पहल पर आयोजित सर्वदलीय बैठक में सभी दलों से राजनीतिक एजेंडे से ऊपर उठने और संक्रमण की टेस्टिंग दुगनी करने पर सहमति बनी। राज्य स्तर पर बेडों की संख्या बढ़ाने, निजी अस्पतालों में कम दरों पर बेड उपलब्ध कराने, रेलवे के पांच सौ कोचों के जरिये चिकित्सा सुविधाओं से लैस 8 हजार अतिरिक्त बेड उपलब्ध कराने का आश्वासन केंद्र ने दिया। इसके अलावा विभिन्न चिकित्सा संगठनों, वरिष्ठ नौकरशाहों को इस लड़ाई में एकजुटता लाने के उद्देश्य से शामिल किया गया। तय किया गया कि बीस जून से दिल्ली में रोज 18 हजार टेस्ट किये जायेंगे। नि:संदेह जब दिल्ली में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 41 हजार को पार कर गया है तो इस चुनौती को गंभीरता से लेते हुए मिलकर लड़ना वक्त की जरूरत है। केंद्र सरकार की कोशिश है कि हर कंटेनमेंट जोन के हर मतदान केंद्र में टेस्टिंग शुरू की जाए। केंद्र सरकार ने चार आईएएस अधिकारियों को आपदा के बेहतर प्रबंधन के लिए लगाया है। सरकार की योजना दिल्ली के राधास्वामी सत्संग परिसर में दिल्ली का सबसे बड़ा कोविड अस्पताल बनाने की है, जिसके लिए दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने परिसर का अवलोकन किया।
भले ही सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद केंद्र व दिल्ली सरकार ने कोरोना के खिलाफ एकजुटता दिखाते हुए सार्थक पहल की है, लेकिन इस पहल का असर जमीन पर भी दिखाई देना चाहिए। पिछले दिनों उपचार को लेकर जो अराजकता व संवेदनहीनता का मंजर नजर आया, उसकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। साथ ही पूरे देश में यह संदेश भी जाना चाहिए कि तमाम राजनीतिक मतभेदों के बावजूद केंद्र व राज्य सरकारें कोरोना को परास्त करने की दिशा में आगे बढ़ी हैं। कई अन्य राज्यों में केंद्र व राज्य सरकारों में कोरोना से निपटने के तौर-तरीकों में टकराव नजर आता रहा है, खासकर उन राज्यों में जहां गैर-भाजपा सरकारें काम कर रही हैं। केंद्र को चाहिए कि समय रहते राज्यों को कोरोना से लड़ने के लिए आवश्यक संसाधन वेंटिलेटर आदि उपलब्ध कराये, क्योंकि कोरोना से लड़ाई लंबी चलती नजर आ रही है। आईसीएमआर के एक शोध समूह के अध्ययन में सामने आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि देश में कोरोना का पीक आने में अभी लंबा वक्त लगेगा, क्योंकि लॉकडाउन के चलते संक्रमण पर नियंत्रण लगा तो इसका चरम कुछ माह आगे खिसक गया। हालांकि, कुछ न्यूज एजेंसियों व प्रतिष्ठित समाचारपत्रों में नजर आई इस रिपोर्ट को आईसीएमआर ने आधिकारिक मानने से इनकार करते हुए खारिज किया है। बहरहाल, रिपोर्ट चेताती है कि मुश्किल वक्त के लिए हमें आईसीयू बेड्स व वेंटिलेटर्स की पर्याप्त व्यवस्था करनी होगी। बहरहाल, कोरोना महामारी के द्वंद्व से गुजरता भारतीय जनमानस कई तरह की आशंकाओं से रूबरू है। जिस तेजी से आपदा का संक्रमण बढ़ रहा है, उसे देखते हुए पुन: लॉकडाउन के किसी सीमा में फिर से सामने आने की चर्चाओं से वह दो-चार है।

The post साझी लड़ाई का वक्त appeared first on दैनिक ट्रिब्यून.



from दैनिक ट्रिब्यून https://ift.tt/2MZ7z8X
via Latest News in Hindi

0 Comments