कक्का जी
कहानी
गोपाल नारायण आवटे
अभी सो कर उठ भी नहीं पाए थे कि पत्नी ने मुझे बताया—‘कक्का जी दरवाजे के बाहर बैठे हैं।’ मैं नींद में ही था, ठीक से जागा नहीं था—‘क्यों बैठे हैं?’
‘पता नहीं, मैं तो दरवाजा खोलने जा रही थी कि जाली में से नज़र पड़ गई। मैं तो घबरा गई थी न जाने कौन है? लेकिन ध्यान से देखा तो वह कक्काजी थे।’ पत्नी ने पूरी बात को स्पष्ट करके कहा।
‘तो उन्हें अन्दर बैठा लेती, मैं थोड़ी देर और सोना चाहता हूं।’ मैंने चादर पांव पर करके मुंह ढांप लिया।
‘न जाने कहां-कहां की मुसीबतें आकर गले पड़ जाती हैं।’ पत्नी बड़बड़ाते हुए बाहर कमरे से हो गई।
मैं भरपूर सोने की चेष्टा करता रहा लेकिन नींद ने मानों हड़ताल कर दी थी। मन तेजी से दौड़, खेतों-गांव-नदी की ओर लौट पड़ा था। अतीत मनुष्य का उसकी मृत्यु के साथ ही समाप्त होता है। अतीत को स्मृत करना और उसमें डूब जाना, एक सुखद अहसास है।
कक्का जी हमारे घर के पास ही रहते थे। उन दिनों उनका जीवन बड़ा संयमी था। नर्मदा नदी का प्रातः स्नान फिर पूजा-पाठ, उसके बाद अन्न ग्रहण करना। काकी भी सद्भावी महिला थीं। बड़ी धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। पति की देखभाल करना ही उनके जीवन का अन्तिम लक्ष्य था।
मैं कॉलेज में था और यदाकदा गांव आता रहता था। कक्का जी आवाज़ देकर पुकार लेते थे—‘ऐ अनिल, इधर तो आ…।’
मैं जब उनके लिए पुते आंगन में आता तो काकी जी भी दरवाजे की ओट से बाहर आ जातीं—‘ले अनिल बेटा ताजा मही (मट्ठा) पी ले।’ मैं भी बिना संकोच के ग्लास थाम लेता था। कक्का जी जान लेना चाहते थे कि मैं शहर में क्या पढ़ रहा हूं? उस पढ़ाई के बाद क्या करूंगा? कितना वेतन मिलेगा? मैं भी विस्तार से बताता था। उनकी आंखों में प्रसन्नता देखकर मैं बहुत खुश होता था। काकी भी पास में बैठकर सब्जी काटने लगता या मुझसे खाना खा लेने का आग्रह करतीं।
ठण्ड के दिनों में तो चूल्हा आंगन में बना होता, जिस पर काकी गर्मागर्म रोटी सेंकती और तुअर की दाल के साथ, पीतल की थाली में खाना परोस देतीं—‘ले खा ले।’
मैं भी बिना कुछ कहे हाथ धोकर खाना खाने बैठ जाता। काकी शहर की बातें सुनती, मेरी प्रगति की बातें जानती। गहरी शाम में चूल्हे की लाल-लाल लपट उनके चेहरे को दीप्तिमान कर देती थी। उनका एकमात्र पुत्र था जो अभी छोटा था, जिसका मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगता था।
कक्का जी कभी कहते—‘अनिल तुझे नौकरी मिल जाए तो बेटा इस गधे को तेरे यहां रखवा दूंगा ताकि यह वहां रहकर कुछ लच्छन सीख जाये।’
‘जरूर कक्का जी’ मैं रोटी को खाता हुआ जवाब देता।
‘बेटा ये गांव, ये बस्ती, हम लोगों को भूल मत जाना?’ काकी कहती।
‘कैसी बात करती हो काकी?’ मैं उनका मन रखने को कहता।
उनका जो बेटा था उसकी शरारतें उसके स्कूल से भाग जाने के किस्से मुझे गांव में सुनने को मिलते, वह चेहरे से ही शरारती और मूढ़ बुद्धि का प्रतीत होता था। न जाने ऐसे परिवार में कहां से जन्म ले लिया था। इधर, मेरी पढ़ाई खत्म करके एस.आई. पुलिस की परीक्षा की तैयारी में लग गया था। सुबह उठना, व्यायाम करना, दौड़ना, पढ़ाई करना इसी में व्यस्त था। गांव भी लगभग नहीं जा पाया था, लेकिन अक्सर जो भी गांव से आता वह घर से लाये सामान के साथ कक्का जी के बेटे का समाचार भी लेते आता था। वह बताता था कि काकी भी बेटे को लेकर कितनी परेशान है। ‘अब तो बेटे ने सिगरेट पीना शुरू कर दी है, घर में से चोरी-छिपे अनाज लेकर शराब का पव्वा भी पी लेता है।’
मैं कल्पना करता था कि कक्का जी कितने दुःखी होते होंगे। काकी तो कक्का जी को देखकर उनसे अधिक दुःखी होती होंगी। एक बार परीक्षा देकर मैं गांव गया था जब कक्का जी के घर के सामने से निकला तो कक्का जी सूनी आंखों से पता नहीं आसमान के पार क्या देखने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने आवाज़ देकर मुझे नहीं पुकारा, लेकिन मेरे पांव ठिठक गए। मैं उनके आंगन में जा पहुंचा। वह मुझे देख नहीं पाए थे, जब पास आया तो चौंक गये—‘रे अनिल कब आया?’
‘बस अभी आया हूं।’ मैं कह ही रहा था कि काकी ने अन्दर से आते हुए प्रेम से कहा—‘सत्तू खायेगा? आज ही हाथ से पीस कर बनाया है।’
‘मैंने आज तक मना किया है?’ मैंने हंसते हुए कहा। चाची ने एक बड़ा कटोरा सत्तू दूध में घोल कर लाकर दे दिया।
‘छोटू दिखाई नहीं दे रहा है?’
‘कहीं दारू पीकर पड़ा होगा।’ कक्का जी के मुंह से ऐसी बात निकलती मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
‘न जाने कौन से जन्म का पाप भोग रहे हैं।’ काकी ने पल्लू से आंसू पोंछते हुए कहना जारी रखा—‘इन्हें परेशान, दुःखी देखकर मेरी जान आधी हो जाती है।’
पूरा वातावरण गम्भीर हो गया था। मैंने कहां छोटू की बात छेड़ दी थी?
‘सब ठीक हो जायेगा।’ मैंने सत्तू पीते हुए कहा।
‘न जाने कब सुधरेगा? मेरे मरने के बाद?’ कक्का जी ने कहा तो काकी नाराज हो गईं।
‘क्या अशुभ बातें करने लगे, बेटा तू इनकी बातों का बुरा मत मान, आजकल इनका दिमाग चल गया है।’ काकी ने कक्का जी का बचाव करते हुए कहा।
मैं क्या कहता? थोड़ी इधर-उधर की बातें करने के बाद लौट आया था। शहर में पुलिस परीक्षा में पास हो गया, फिर ट्रेनिंग के लिए चला गया। इस मध्य एक बार एक दिन के लिए आना हुआ था। मां ने ही बताया था कि ‘कक्का जी का बेटा बिगड़ गया है। राहजनी करने लगा है, घर का सामान चुरा कर शराब पीने लगा है, पूरे गांव का नाम बदनाम कर दिया है।’
मुझे समय भी नहीं था। मैं आराम करके लौट गया था। इसी मध्य प्रशिक्षण पूरा होने के बाद मुझे नौकरी के लिए एक थाना भी मिल गया।
जीवन अच्छे से चल रहा था कि एक दिन एक अपराधी को मारपीट के आरोप में पकड़ कर लाए थे। कुछ देर बाद कक्का जी भी पूछते-पूछते थाने में आ पहुंचे। मैंने आगे बढ़कर चरण स्पर्श किये। वह मारपीट करके लाया गया छोटू ही था। कक्का जी उसकी जमानत लेने आये थे। मैंने छोटू को बुलवाया, प्यार से समझाया और बिना कोई केस बनाये जाने दिया। कक्का जी ने हज़ार आशीष दिये। मैं जो कुछ थोड़ा-बहुत कर सकता था कर दिया था। लेकिन छोटू के हौसले बढ़ गए थे। आये दिन उसकी खबरें मिलने लगी थी। आखिर एक दिन मैंने ही उसे पकड़ लिया। मारपीट नहीं की, लेकिन जेल में भिजवा दिया।
इस बार काकी जी आई थी। नीची नज़रें किए हुये थी। मुझे बड़ी शर्म आई, वकील करवाया, जमानत करवाई और छुड़वाया। इस तरह मैंने ही पकड़ा और मैंने ही छुड़वाने में मदद की। मेरा स्थानान्तरण इस थाने से हो गया था। चोर, डाकू, अपराधियों के बीच पूरा समय निकलने लगा था। गांव छूट गया था। उड़ती-उड़ती खबर मिली थी कि काकी जी का स्वर्गवास हो गया। पुत्र का कोई भी सुख उन्हें नसीब नहीं हो पाया। काकी जी की मौत का समाचार मुझे कुछ देर दुःखी कर गया था। छोटू कोई बड़े अपराध में लम्बी सज़ा काट रहा था। मैं नगर निरीक्षक से डी.एस.पी. की पोस्ट तक जा पहुंचा था।
समय तेज़ी से आगे बढ़ते जा रहा था। बहुत कुछ पीछे छूट गया था। एकाध बार कक्का जी अपने बेटे के लिए आये थे, लेकिन मैं कुछ विशेष करने की स्थिति में था भी नहीं।
बरसों बाद आज कक्का जी न जाने कैसे आ गए? न जाने कैसे पता लगा लिया कि मैं यहां पदस्थ हूं शायद घर से पता लिया होगा।
मुझे बिस्तर पर काफी देर हो गई थी। मजबूरी में उठा, फ्रेश हुआ, जब तक पत्नी उन्हें चाय पिला चुकी थी। मैं जब उनके सामने आया तो देखा कक्का जी के बाल पूरे सफेद हो गये थे। सफेद धोती कमीज में वह देवदूत समान लग रहे थे। मैंने वैसे ही औपचारिक रूप से पांव छूने का अभिनय किया।
‘खुश रहो, फलो फूलो।’ उन्होंने मुझे आशीश दिया। जानता था कि पिता से जीवनभर पुत्र मोह जाता नहीं है और यह जान रहा था कि वह अब अपनी ‘छोटू की कथा प्रारम्भ करेंगे।’
मैंने उनकी कथा शुरू होने के पूर्व ही कहना शुरू कर दिया—‘नाश्ता आपका हुआ?’
‘हो जायेगा बेटा।’
‘आजकल काम खूब बढ़ गया है, सरकार भी जान लिये ले रही है—अपराध और अपराधी दोनों बढ़ गए हैं। महीने में हमें कक्का जी टारगेट मिला है कि इतने अपराधियों को पकड़ना ही है, आप ही बताइए यह भी कोई बात है।’ मैं मूर्खों की तरह अपनी बातों को रख रहा था। कक्का जी ने भी सिर हिलाते हुए कहा—‘सच कह रहे हो बेटा, अपराध खूब बढ़ गए हैं। जीवन जीना हराम हो गया है।’ कक्का जी द्वारा मेरी बात का समर्थन होते देख मैं खुश हो गया, क्योंकि जानता था कि इस तरह छोटू की कोई भी सिफारिश वह नहीं कर पायेंगे। मैंने ही कहा—‘आप नहा-धो कर भोजन करें, मुझे ड्यूटी की तैयारी करना है।’
‘नहीं बेटा, मैं अधिक समय नहीं ठहरूंगा, मैं तो तीर्थ के लिए निकल रहा हूं, घर बेच दिया, अब कुछ भी मोह नहीं है।’
‘आप कैसी बातें कर रहे हैं।’
‘ठीक कह रहा हूं।’
‘फिर आपका आना कैसे हुआ?’ मुझे आश्चर्य हो रहा था।
‘अब क्या कहूं बेटा, मोह तो छूटता नहीं है।’ उन्होंने कहा, और मेरा दिल धड़का।
अब कक्का जी मतलब की बात कहेंगे। कक्का जी ने इधर-उधर देखा और कहा—‘बेटा तेरी काकी ने तुझे बेटे जैसा देखा, तूने हमारी बहुत मदद की, इतना तो सगा भी नहीं करता है।’ कहकर अपनी थैली में से एक कागज़, पासबुक निकाल कर देते हुए कहा—‘इसमें रुपये जमा हैं, मैंने रुपये का वारिस (नॉमिनी) तुम्हें बनाया है, स्टाम्प पर लिख भी दिया है, मैं अब नहीं लौटा तो यह सब रुपये तू रख लेना… हैं?’ फिर इधर-उधर देखकर पत्नी को बुलाया और थैली में से कुछ सोने-चांदी के जेवर देते हुए कहा—‘ये बहू तुम्हारे लिए, अब तीर्थ पर इसका क्या मोह? रख लो।’ संकोच के बाद पत्नी ने रख लिये।
कक्का जी जाने के लिए उठ खड़े हुए—‘बेटा मेरे सिर का बहुत बड़ा बोझ कम हो गया।’ मुझे बड़ी शर्म आ रही थी कि मैं क्या कल्पना कर रहा था। यह तो सब उलटा हो गया। अपनी झेंप मिटाना चाहता था तब ही पत्नी ने मीठे स्वर में कक्का जी से कहा—‘आप कुछ दिनों तक यहां रुकें, फिर जाना, आप हमारे बड़े बुजुर्ग हैं।’ आज तक मैंने पत्नी के मुंह से इतनी मीठी बात नहीं सुनी थी। उसके स्वर में यह मिठास जेवर के मूल्यों के चलते आ गई थी।
कक्का जी ने आशीर्वाद दिया और अपनी थैली लेकर जाने के लिए उठ खड़े हो गये। मुझे अभी तक अपनी कही बातों पर शर्म आ रही थी। मैं अपनी झेंप मिटाना चाहता था।
अपनी शर्म को छिपाते हुए मैंने कक्का जी से पूछा—‘और छोटू कहां है?’
कक्का जी जाते-जाते रुक गये। खड़े होकर मेरे चेहरे को देखा, फिर कहने लगे—‘बेटा उसका जेल में रहना ही अच्छा है, कम से कम लोग सुरक्षित तो हैं फिर अब मुझे उसका भी मोह नहीं रहा है। मैं तो तुम्हारे और बहू के मोह के चलते यहां आया।’ कहते-कहते कक्का जी का गला भर आया।
पत्नी ने सिर पर पल्लू लेकर उनके चरण को स्पर्श किया, उन्होंने ढेर-सा आशीर्वाद दिया। एक डेड़ घण्टे रुक कर कक्का जी चले गये। बरसों बीत जाने के बाद भी वह नहीं लौटे हैं, लेकिन इतने बरसों बाद भी वह झेंप, वह शर्म से मैं मुक्त नहीं हो पाया हूं। प्रत्येक व्यक्ति सिर्फ अपने मतलब से ही आया हो, ज़रूरी नहीं है। कक्का जी ने मुझे जीवन भर के लिए सीख दे दी थी।
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