राहुल सिंह

मेरे सम्माननीय 80 पार चुके बुजुर्ग हैं शर्मा जी, पिछले दिनों तटस्थ भाव से कहा-पत्नी बिस्तर पर है, मेरे सामने चली जाए तो ठीक, यदि मैं पहले गया तो उनकी देखभाल कौन करेगा। हम आपस में बात करने लगे कि उनके बच्चे बहू…, सब हैं, ‘भरा-पूरा परिवार’, दोनों नौकरी-पेशा हैं वगैरह…वगैरह। कुछ बरस पहले बिलासपुर में एक अखबार ने जानना चाहा कि ऐसा कौन सा सरकारी दफ्तर है, जो सबसे कम जनोपयोगी है, इसमें अव्वल नंबर पर था पुरातत्व विभाग यानी मेरा कार्यालय। मैंने उन पत्रकार महानुभाव का पता करने की कोशिश की, प्रेस ने तो नहीं बताया लेकिन पता लग गया, वे युवा पत्रकार परिचित निकले और स्वयं पहल कर खेद व्यक्त किया। बाद में प्रत्यक्ष मुलाकात में मैंने स्पष्ट‍ किया कि यह तो मेरे लिए अपेक्षित था, क्योंकि इस कार्यालय का सामान्य-जन से सीधा ताल्लुक कम ही होता है। मैं यह भी मानता हूं कि पुरातत्व‍-संस्कृति जैसी चीज हाशिये पर ही होनी चाहिए। मुख्य धारा में तो रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी, सड़क और भू-राजस्व के साथ कानून-व्यवस्था को ही होना चाहिए। राग-रंग को हाशिये पर ही होना चाहिए। पुरातत्व-संस्कृति मुख्य धारा में आए तो इनका और समाज दोनों का बंटाधार होते देर नहीं।
बहरहाल, इस भावनात्मक उबाल को मेरी जानकारी में, समय और बाजार ने जल्द ही ठंडा कर दिया और अंततः क्या हुआ मुझे पता नहीं, लेकिन लुगदी बना देने वाली बात से यह सवाल अब तक बना हुआ है कि सामाजिक-जासूसी उपन्यास, जो लुगदी साहित्य कह कर खारिज किए जाते हैं, बड़ी संख्या में छपते-बिकते और पढ़े जाते हैं, सहेज कर रखे भी जाते हैं। तब सोचें कि ‘लुगदी-पल्प’ मुहावरा और शब्दशः के फर्क की विवेचना से क्या बातें निकल सकती हैं। लुगदी की तरह मटमैले कागज पर छपने वाला लेखन होने के कारण लुगदी साहित्य कहा जाता है या छपने-पढ़ने के बाद जल्द लुगदी बना दिए जाने के कारण। यह नि:संदेह कि प्रतिष्ठित साहित्यकार भी अधिक से अधिक बिकना चाहता है और लुगदी लेखन करने वाले, साहित्यिक बिरादरी में अपने ठौर के लिए व्यग्र दिखते हैं। खैर लेखन हो या अन्य बातें, भावनाओं का ज्वार-भाटा तो उमड़ता-घुमड़ता ही है। बातें कई हैं और बातों से ही बातें निकलती हैं।
साभार : अक्लतारा डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम

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