महिला अधिकार संरक्षण

अनूप भटनागर
‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारे के साथ दोबारा सत्तासीन हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली नयी सरकार को देश-दुनिया की तमाम चुनौतियों की रूपरेखा तैयार करते समय देश की महिलाओं को समुचित सुरक्षा प्रदान करना और उनके हितों की रक्षा के मुद्दे को भी प्राथमिकता देनी होगी।
महिलाओं के हितों की रक्षा के मामले में दो मुद्दे सबसे अधिक प्रमुख हैं : पहला, संसद और विधानमंडलों में महिलाओं की भागीदारी 33 प्रतिशत करने संबंधी संविधान संशोधन विधेयक को कानूनी रूप दिलाना और दूसरा, मुस्लिम समाज में प्रचलित तीन तलाक की कुप्रथा से मुस्लिम महिलाओं को संरक्षण प्रदान करने के लिये इसे दंडनीय अपराध बनाने संबंधी प्रक्रिया को कानूनी रूप प्रदान करना।
विभिन्न दलों से 78 महिलायें चुनाव जीतकर इस बार लोकसभा पहुंची हैं। महिला प्रतिनिधियों की यह संख्या अब तक लोकसभा पहुंचने वाली महिला सांसदों में सर्वाधिक है। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि ये महिला सांसद दलगत राजनीति से ऊपर उठकर महिलाओं के हितों की रक्षा के लिये इन दोनों कानूनों को अमलीजामा पहनाने के लिये सरकार और अपने दलों पर कारगर तरीके से दबाव बनाने में सफल होंगी।
संसद और विधानमंडलों में महिलाओं के लिये 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने संबंधी 108वां संविधान संशोधन विधेयक नौ साल पहले मई 2010 में राज्यसभा ने पारित किया था। लेकिन 15वीं लोकसभा के कार्यकाल के दौरान राजनीतिक दलों की तमाम आपत्तियों को देखते हुए तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार इसे लोकसभा में पेश करने का साहस नहीं जुटा सकी। अब नौ साल बीत चुके हैं और यह विधेयक अभी तक लोकसभा से पारित नहीं कराया जा सका है। यह भी कहा जा सकता है कि 15वीं और 16वीं लोकसभा में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इसे पारित कराने की मांग ही नहीं की गयी।
हां, 16वीं लोकसभा के अंतिम सत्र के दौरान महिला आरक्षण का मुद्दा सदन में उठा लेकिन ऐसा लगता है कि यह सिर्फ रस्म अदायगी ही थी। लेकिन चुनाव के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष ने इस विषय को दबी जुबान में उठाया था। नयी लोकसभा में चूंकि पहली बार सर्वाधिक 78 महिलायें निर्वाचित होकर पहुंची हैं, इसलिए आशा की जानी चाहिए कि महिलाओं के हितों की रक्षा से जुड़ा यह विधेयक पारित कराने के लिये ये सरकार पर दबाव बनायेंगी।
जहां तक तीन बार तलाक कह देने के चलन को अपराध के दायरे में लाने का मुद्दा है तो राजग सरकार ने इस संबंध में लोकसभा से मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक पारित कराया था लेकिन इस विधयेक को राज्यसभा से पारित नहीं कराया जा सका। 16वीं लोकसभा का कार्यकाल खत्म होने के साथ ही यह विधेयक भी निष्प्रभावी हो गया।
तीन तलाक को कानून के दायरे में लाने संबंधी इस विधेयक को पारित कराने के लिये सरकार को अब नये सिरे से कदम उठाने होंगे। लोकसभा में तो इस विधेयक को पारित कराने में उसे दिक्कत नहीं होगी लेकिन पिछली बार की तरह ही राज्यसभा में बहुमत नहीं होने की वजह से उसे एक बार फिर चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। राज्यसभा से विधेयक पारित कराने में सफलता नहीं मिलने की वजह से सरकार को इसे पारित कराने के लिये नये सिरे से कदम उठाने होंगे।
राजग सरकार ने 2017 में पहली बार मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2017 लोकसभा से पारित कराया था। लोकसभा में इस विधेयक का कांग्रेस ने भी समर्थन किया था लेकिन राज्यसभा में कांग्रेस के जबरदस्त विरोध की वजह से मुस्लिम महिलाओं को एक बार में तीन तलाक अर्थात तलाक-ए बिद्दत के दंश से बचाने के लिये कानून बनाने की कवायद विफल हो गयी थी। इसके बाद सरकार ने तलाक-ए-बिद्दत को अपराध की श्रेणी में रखने और इसे दंडनीय अपराध बनाने के लिये तीन बार अध्यादेश जारी किये थे।
उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ पहले ही एक बार में तीन तलाक देने के कृत्य को गैरकानूनी, अनैतिक और महिलाओं की गरिमा के खिलाफ करार दे चुकी है। लोकसभा से इस संबंध में विधेयक पारित होने के बाद तीन तलाक दंडनीय अपराध बन गया। राज्यसभा से विधेयक पारित कराने में सफलता नहीं मिलने पर इस साल फरवरी में तीसरी बार सरकार अध्यादेश लायी थी। उम्मीद की जानी चाहिए कि महिलाओं के लिये आरक्षण और मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के दंश से बचाने संबंधी विधेयकों को पारित कराकर कानूनी दर्जा दिलाने में नयी सरकार सफल होगी।

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