कोई रहता है आसपास मेरे
और धड़कता है दिल के साथ मेरे
उसको अपना भी कह नहीं सकते
कितने मजबूर ये हालात मेरे
चांद तारों को पकड़ना चाहा
गर्द-ए-ज़िल्लत में सने हाथ मेरे
इतने देखे हैं रंग दुनिया के
स्याह पड़ने लगे जज़्बात मेरे
कुछ नहीं जाएगा इस दुनिया से
उसकी चाहत के सिवा साथ मेरे
मैं तो खुश हूं कि इस ज़माने पर
चोट करते हैं ये अल्फ़ाज़ मेरे…

शब्दार्थ :
गर्द-ए-ज़िल्लत : बदनामी की धूल
स्याह : काले

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