डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सिक्ख सम्प्रदाय के पांचवें गुरु अर्जुनदेव जी का जन्म, विक्रम संवत 1620 के वैशाख मास कृष्ण पक्ष की सप्तमी को गोइंदवाल में गुरुराम दास और माता भानी के परिवार में हुआ था। उनकी पत्नी का नाम गंगाजी और पुत्र का नाम हरगोविंद सिंह था। जो आगे चलकर सिक्खों के छटवें गुरु हुए थे। गुरु अर्जुनदेव जी के जन्म उत्सव को ‘गुरुअर्जुन जयंती’ के रूप में मनाया जाता है, जो इस बार 26 अप्रैल 2019 को मनाया जाएगा। इस शुभ अवसर पर गुरुद्वारों में भव्य कार्यक्रम सहित गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ एवं सामूहिक भोज (लंगर) का आयोजन किया जाता है। अमृतसर, तरनतारन, भैणी, सरहाली, खडूर साहिब, गोइंदवाल, करतारपुर समेत अनेक सिख धार्मिक स्थानों पर उनकी जयंती बहुत ही धूमधाम से मनाई जाती है। गुरु अर्जुनदेव का जीवन परिचय गुरु अर्जुन देव जी की उम्र 16 वर्ष थी, तो 23 आषाढ़ संवत 1636 को आपकी शादी श्री कृष्ण चंद जी की सुपुत्री गंगा जी शादी हुई। यह शादी तहसील फिल्लोर के मऊ नामक स्थान पर हुई थी। गुरु अर्जुनदेव जी ने संवत 1638  में और अंग्रेजी सन सितम्बर 1581 में हिंदी माह भाद्रपद की एकम तिथि को धर्मगुरु की उपाधि प्राप्त की थी। अर्जुनदेव जी साहिब का धर्मगुरु संस्कार गुरु रामदास साहिब जी ने ‘शब्द हज़ारे’ की प्रसिद्धि पर बड़ी ही प्रसन्नता पूर्वक किया। गुरुग्रंथ साहिब का संपादन गुरु अर्जुनदेव ने 'अमृत सरोवर' का निर्माण कराकर उसमें 'हरमंदिर साहब' का निर्माण भी कराया, जिसकी नींव सूफ़ी संत मियां मीर के हाथों से रखवाई गई थी। गुरु अर्जुनदेव जी बहुत शांत एवं बड़े प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनि थे, उन्होंने ही गुरु ग्रंथसाहिब का संपादन अपने बड़े भाई गुरदास की सहायता से संवत 1604 में किया था। सम्पादन करते समय आताताई लोगों ने भ्रान्ति (अफवाह) फैलाई कि गुरु ग्रंथसाहिब को इस्लाम के विरुद्ध लिखा गया है, परन्तु जब बादशाह अकबर को इस ग्रंथ की पवित्रता का सही ज्ञान हुआ तो उन्होंने खेद(क्षमा) प्रकट करते हुए गुरु अर्जुनदेव जी को 51 मोहरें ससम्मान भेंट में दीं। उन्होंने एक नगर भी बसाया जिसका नाम रखा गया तरनतारन नगर कई लोगों का यह भी मत है कि शहजादा खुसरो को शरण देने के कारण जहांगीर गुरु अर्जुनदेव जी से नाराज था। 15 मई 1606 ई. को बादशाह ने गुरु जी को परिवार सहित पकडने का हुक्म जारी किया था। गुरु अर्जुनदेव जी ने अपने उपदेश में ये ख़ास बात की  - सुबह जल्दी उठ कर स्नान करके वाहिगुरु मंत्र का स्मरण करना और गुरबाणी पढ़ना चाहिए। - दोनों हाथों की कमाई का निर्वाह करना योग्य लोगों (जरूरतमंदों) को दान करना चाहिए। - और अपने अहंकार का त्याग करना चाहिए।

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