लोकसभा के लिए चुनावों के अंतिम परिणाम 23 मई को आने के साथ इस समय उपलब्ध सभी संकेत बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने 2014 के प्रदर्शन को दोहराने में असमर्थ है क्योंकि इसने विशेष रूप से काले धन के उन्मूलन, हर साल दो करोड़ नौकरियों का सृजन, किसानों की समस्याओं को दूर करने, राम मंदिर निर्माण आदि के बारे में अपने वादों को पूरा नहीं किया। दूसरी ओर लोगों के सामाजिक-आर्थिक संकटों को बढ़ाने में नोटबंदी और जीएसटी के अधूरे और कठिन कार्यान्वयन ने मोदी सरकार के प्रति लोगों के मोह को तोड़ा है और लोगों ने दिसबंर 2018 में तीन प्रमुख राज्यों -छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश में भाजपा के खिलाफ मतदान करके अपने असंतोष को जाहिर किया है।

पतन की ओर

तीन राज्यों में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार के निष्कासन के बाद जनवरी में हुए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में ऐसे उभार सामने आए हैं जिसमें केंद्र में सत्ता बरकरार रखने के लिए पर्याप्त संख्या जुटाने में भाजपा की असमर्थता की भविष्यवाणी की गई है। विपक्षी एकता के प्रयासों ने कर्नाटक में मई 2018 में जद(एस) और कांग्रेस के गठबंधन के नेतृत्व वाली सरकार की स्थापना के बाद गति पकडऩा शुरू कर दिया था हालांकि भाजपा शायद ही कभी इस विकास को लेकर चिंतित थी।

उत्तरपद्रेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के एक साथ आने और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा गैर -भाजपा राजनीतिक दलों को एक साथ लाने के प्रयासों और इस साल जनवरी में कोलकत्ता में विपक्षी रैली ने भाजपा को कुछ कमजोर किया, हालांकि उन्होंने घबराहट को प्रदर्शित नहीं किया। इस साल फरवरी के दूसरे सप्ताह तक हुए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में से अधिकांश ने आगामी चुनावों में भाजपा की घटती लोकप्रियता की भविष्यवाणी की है।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर पूंजीकरण

हालांकि पुलवामा में हुआ आतंकवादी हमला जिसमें 14 फरवरी को 40 से अधिक सीआरपीएफ के जवान शहीद हो गए थे और इसके बाद 26 फरवरी को पाकिस्तान के अंदर बालाकोट में भारतीय वायु सेना द्वारा की गई एयर स्ट्राइक, इसके बाद एयरफोर्स के पकड़े गए पायलट अभिन्ंादन को पाकिस्तान द्वारा छोड़े जाने की क्रिया ने राष्ट्रीय परिवर्तन में सहायक की भूमिका निभाई। इसने बुनियादी मुद्दों जैसे बेरोजग़ारी, कृषि संकट और राफेल घोटाले से लोगों का ध्यान हटाकर आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर केंद्रित कर दिया। इससे भाजपा की लोकप्रियता के ग्राफ में उसके प्रतिद्वंदियों की अपेक्षा ज़्यादा बढ़ोतरी हुई।

इस समय कई आलोचकों ने कहा कि यह कहना बहुत सरल था कि पुलवामा और बालाकोट ने प्रधानमंत्री मोदी को दूसरे कार्यकाल की गारंटी दी है। हालांकि पुलवामा और बालाकोट जनता की याददाशत में कम हो गया और भारत-पाकिस्तान के बीच लगातार गतिरोध के खत्म होने के साथ भारत की परेशानी का अंत हो गया। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह सब आगामी चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी को नुकसान पहुंचा सकता है। चुनाव की तारीखों की घोषणा और चुनाव कोड के प्रभाव में आने के साथ चुनाव प्रचार को उत्साह मिला है और पीएम मोदी की रैलियों में बड़ी सार्वजनिक उपस्थिति का अभाव भाजपा के लिए चिंता जनक है। पुलवामा और बालाकोट से उत्पन्न राष्ट्रवादी भावना के मद्देनजऱ भाजपा को चुनावी लाभांश फिर से हासिल करने की उम्मीद थी पर जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने न्याय योजना, आय योजना को लागू करने का वादा किया तब उन्हें जोरदार झटका लगा। एक आलोचक के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी को शायद समझ में आ गया कि कांग्रेस ”आय पर चर्चा’ के माध्यम से मोदी-शाह के चुनाव से पहले के जुमलों के खिलाफ पहल करने की शुरूआत कर रही है।

राष्ट्रवादी आख्यान में लोगों के कम होते रूझान को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने 27 मार्च को एक ट्वीट कर घोषणा की कि वह एक महत्वपूर्ण संदेश के साथ देश को संबोधित करेंगे। जिसे ट्वीट के एक घंटे के बाद प्रसारित किया गया और इस एक घंटे के अंतराल में लोग घोषणा के बारे में कयास लगाते रहे क्योंकि मोदी को विमुद्रीकरण जैसे आश्चर्य के लिए जाना जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने ए-सैट के माध्यम से अंतरिक्ष में भारत की प्रगति की घोषणा की और इसका राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए भाजपा द्वारा इसे एक कदम माना गया। कुछ आलोचकों का कहना है कि भाजपा के इस तरह के प्रयास से ऐसा लगता है कि भाजपा कुछ ऐसा पाने के लिए जमीन पर गिर रही है जो उसे लोगों से जोड़ सकता हो। एक अन्य आलोचक ने कहा है कि मोदी के कार्यकाल से यह स्पष्ट हो सकता है कि वे मतदाताओं की मिल रही प्रतिक्रिया से चिंतित हैं।

कम संभावनाएं

भाजपा के अपने 2014 के प्रदर्शन को दोहराने की संभावनाएं कम प्रतीत होती हैं। युवाओं के लिए नौकरियां, कृषि संकट जैसे चिरस्थायी मुद्दों पर अपने वादों को पूरा करने में विफलता के साथ कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव और क्षेत्रीय दलों के बढ़ते गठजोड़ से भाजपा की चुनावी पकड़ में सेंध लगने की सभावना है। यह अभी हाल में हुए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों द्वारा प्रमाणित भी है। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान में हारने के बाद भाजपा को अपने 2014 में 65 सीटों में से 64 सीटें जीतने के प्रदर्शन को दोहराना काफी कठिन है। मध्यप्रदेश में जहां भाजपा ने 2014 में 29 में से 27 सीटें जीती थीं वहां पोल आईज की भविष्यवाणी के अनुसार भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। पोल आईज की भविष्यवाणी के अनुसार झारखंड में जहां 2014 में एनडीए ने 14 में से 12 सीटें जीती थी वहां एनडीए पांच सीटों पर आगे है जबकि यूपीए नौ सीटों पर आगे है। छत्तीसगढ़ जहां कांगे्रस ने पिछले दिसबंर में विधानसभा चुनावों में शानदार जीत दर्ज की वहां भाजपा को बड़ा झटका लगने की संभावना है। गुजरात में जहां भाजपा ने 2014 में सभी 26 सीटें जीती वहां पोल सर्वे के अनुसार अब 16 सीटें जीतने की संभावना है।

उत्तरप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल किसी भी पार्टी के लिए केंद्र में सत्ता हासिल करने के लिहाज से महत्वपूर्ण राज्य हैं। 2014 में भाजपा ने उत्तरप्रदेश में बहुमत पाया और बिहार में अच्छी संख्या में सीटें हासिल कीं। महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन किया और भारी संख्या में सीटें हासिल कीं। हालांकि वर्तमान समय में उत्तरप्रदेश और बिहार के परिदृश्य में बढ़ा परिवर्तन आया है। एसपी, बसपा और आरएलडी के बीच गठबंधन ने भाजपा को प्रभावित किया है और कांग्रेस ने भी अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। इस एकजुटता के प्रभाव ने भाजपा की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा है। चुनाव पूर्व अधिकांश सर्वेक्षणों ने सपा-बसपा गठबंधन को लाभ मिलने और भाजपा के लिए 2014 के प्रदर्शन को दोहराने को खारिज करने की भविष्यवाणी की है। महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना के गठबंधन को 2014 की तुलना में कमतर आंकने का अनुमान है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा टीएमसी के साथ अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष कर रही है । हालांकि यहां उसके वोटों के प्रतिशत में सुधार आ सकता है। ओडिशा में बीजद के पास भाजपा के मिलकर कुछ सीटों पर बढ़त बनाने की संभावना है आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में पहले से ही सत्ता पर काबिज पार्टियों द्वारा भाजपा को कोई स्थान ने देने की संभावना है। भाजपा को एआईंडीएमके के साथ गठबंधन के कारण तमिलनाडु में कुछ सीटें मिलने की संभावना है और केरल में हुए अलग-अलग चुनाव पूर्व सर्वे के अनुसार यहां एक सीट सुरक्षित कर सकती है। असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों मेंजहां भाजपा ने 2014 में अच्छा प्रदर्शन किया था लेकिन नागारिकता बिल लगाने के भाजपा के कदम के खिलाफ सार्वजनिक नाराजगी के मददेनजऱ अब वहां वैसा प्रदर्शन दोहराने की संभावना नहीं है, इस प्रकार समग्र परिदृश्य आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा को बहुमत हासिल करने के लिए एक निराशाजनक संभावना प्रस्तुत करता है।

भविष्य में

निस्संदेह 23 मई को अंतिम परिणाम घोषित किया जाएगा। फिर भी भाजपा के लिए केंद्र में सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए रूझान प्रतिकूल हैं। अगर भाजपा लगभग 200 सीटों को जीतने में सफल होती है तो राजग के अन्य घटक दल महागठबंधन सरकार बनाने के लिए अपनी शर्तों को निर्धारित करने के लिए मज़बूत स्थिति में होंगे। जाहिर है कि भाजपा के सबसे बड़े दल के रूप में उभरने की संभावना है और इसे सत्ता पर काबिज होने के लिए अन्य क्षेत्रीय दलों का समर्थन लेना होगा। यदि अन्य घटक दल मोदी के नेतृत्व को अस्वीकार करते हैं तो भाजपा में विभाजन की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए इस तरह की संभावना इसका अनुमोदन करती है: 23 मई भाजपा गई?

लेखक न्यूज24 चैनल के कार्यकारी संपादक हैं।

यहां दिए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।

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